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Chapter 2: Basic Terminology of Accounting : Part 2

नमस्कार दोस्तों 
मै विनय आपका दोस्त 
आपका बहुत बहुत स्वागत है 
आशा करता हूँ आप अच्छे और सवस्थ होंगे

Chapter 2: Basic Terminology of Accounting : Part 2

1. लेनदार (Creditor) : वह व्यक्ति या संस्था जो किसी अन्य व्यक्ति या संस्था को उधार माल या सेवाएँ बेचती हैं या रुपया उधार देती हैं। ऋण दाता या लेनदार (Creditor) कहलाती है। लेनदार को भविष्य में ऋणी से धनराशि प्राप्त होना होता है। 
संक्षेप में, जब हम किसी से उधार माल खरीदते हैं तो वह हमारा लेनदार (Creditor) कहलाता हैं। 

2. देनदार (Debtor) : वह व्यक्ति या संस्था जो किसी अन्य व्यक्ति या संस्था से उधार माल या सेवाएँ खरीदती है या रुपया उधार लेती है। ऋणी या देनदार (Debtor) कहलाती हैं। देनदार को भविष्य में एक निश्चित अवधि के बाद पैसा चुकाना होता है। 
संक्षेप में, जब हम किसी को उधार माल बेचते हैं तो वह हमारा देनदार (Debtor) कहलाता है।        
   
3. पूँजी (Capital) : व्यापार का स्वामी (Owner) जो रुपया, माल या सम्पति व्यापार में लगाता है उसे पूँजी कहते हैं। व्यापार में लाभ होने पर पूँजी बढ़ती है और हानि होने पर पूंजी घटती हैं।    

4. स्वामी (Owner) : वह व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह जो व्यापार में आवश्यक पूँजी लगाते हैं, व्यापार का संचालन करता हैं, व्यापार की जोखिम सहन करते हैं तथा लाभ और हानि के हकदार होते है। व्यापार के स्वामी कहलाते हैं।
यदि किसी व्यापार का स्वामी /मालिक एक व्यक्ति है तो वह एकाकी व्यापारी यानि proprietor कहलाता है और यदि मालिक दो या दो से अधिक व्यक्ति हैं तो साझेदार यानि partners कहलाते हैं। यदि बहुत से लोग मिलकर संगठित रूप से कंपनी के रूप में कार्य करते हैं तो वे उस कंपनी के अंशधारी यानि शेयर होल्डर्स कहलाते हैं। 

5. आहरण (Drawings) : व्यापार का स्वामी अपने निजी खर्च के लिए समय समय पर व्यापार में से जो रुपया या माल निकालता है। वह उसका आहरण (Drawings) या निजी खर्च कहलाता है।   

6. संपत्ति (Assets) : व्यापार या व्यवसाय की ऐसी समस्त वस्तुएँ जो व्यापार या व्यवसाय संचालन में सहायक होती है और जिन पर व्यवसायी का स्वामित्व होता है संपत्ति कहलाती हैं। 
ये दो प्रकार की होती हैं। 
A) स्थायी संपत्तियाँ 
B) चालू संपत्तियाँ   

A) स्थायी संपत्तियाँ (Fixed Assets) : इनसे आशय उन संपत्तियों से है जो व्यवसाय में दीर्घकाल तक रखी जाने वाली होती हैं। यानि जिनका लाभ व्यापार में कई वर्षों तक मिलता रहता है और जो पुनः बिक्री के लिए नहीं होती। हैं। 
उदाहरण के लिए जमीन, बिल्डिंग, वाहन, मशीन, फर्नीचर, कंप्यूटर इत्यादि।   

B) चालू संपत्तियाँ (Current Assets) : इनसे आशय उन संपत्तियों से है जो आमतौर पर एक वर्ष से कम समय में उपयोग की जाती हैं। यानि जो लंबे समय तक व्यापार में नहीं रहती हैं। जैसे : नकदी या जिन्हे आसानी से नकदी में बदला जा सकें। जैसे : देनदार (Debtors), बैंक बैलेंस, स्टॉक्स इत्यादि। 

7. दायित्व (Liabilities) : वे सभी ऋण (Loan) जो व्यापार को अन्य व्यक्तियों अथवा अपने स्वामी या स्वामियों को चुकाने होते हैं। उसे दायित्व (Liabilities) कहते हैं। 
ये दो प्रकार के होते हैं। 
A) स्थायी दायित्व (Fixed Liabilities)
B) चालू दायित्व (Current Liabilities)   
         
A) स्थायी दायित्व (Fixed Liabilities) : इनसे आशय ऐसी देनदारियों से है जिनका भुगतान दीर्घकाल के पश्चात या व्यापार की समाप्ति पर करना होता है। जैसे : दीर्घकालीन ऋण (Long Term Loan), पूँजी (Capital), बिल्डिंग या जमीन को गिरवी रख कर बैंक से लिया हुआ लोन इत्यादि। 

B) चालू दायित्व (Current Liabilities) : इनसे आशय ऐसी देनदारियों से है जिनका भुगतान जल्दी ही भविष्य में करना हो। ज्यादातर यह 1 साल से काम समय में चुकाना होता हैं यानि यह अस्थायी  होता है। जैसे : अल्पकालीन ऋण (Short Term Loan), लेनदार (Creditors) बैंक लोन Cash Credit Limit इत्यादि। 

8. अदत्त व्यय(Outstanding Expenses) : ऐसे समस्त व्यय जिनकी सेवाएँ तो प्राप्त कर ली गयी हैं परन्तु उनके मूल्य का भुगतान अभी तक नहीं किया गया हैं। जैसे कि महीने की समाप्ति पर कर्मचारी की सैलरी बाकी है या माकन मालिक का किराया बाकी हैं यानि देना हैं किन्तु दिया नहीं गया है तो महीने की समाप्ति पर इसका प्रावधान (Provision) करना होगा। इस तरह के प्रावधान (Provision) को अदत्त व्यय कहते हैं।              

9. मूल्य ह्रास (Depreciation) :  किसी वस्तु या संपत्ति के उपयोग से, समय व्यतीत हो जाने पर, मूल्यों में परिवर्तन से, नष्ट हो जाने या अन्य किसी कारण से जब संपत्ति के मूल्य में कमी आ जाती है तो इस मूल्य में होने वाली कमी को मूल्य ह्रास (Depreciation) कहते हैं। 

10. वित्तीय वर्ष (Financial Year) : यह 12 महीने की अवधि होती है जिसका हमलोग लेखा जोखा प्रस्तुत करता हैं। चूँकि यह अवधि 12 महीने की होती है, इसलिए इसे वित्तीय वर्ष (Financial Year) कहते हैं। हमारे भारत में यह अवधि वित्तीय वर्ष (Financial Year) 1 अप्रैल से शुरू होकर 31 मार्च को समाप्त होता है। 

11. खाता (Account) : जब किसी व्यक्ति विशेष, वस्तु, सेवा या आय - व्यय इत्यादि से संबधित समस्त लेन - देन एक निश्चित स्थान पर तिथिवार और नियमानुसार रखें जाते हैं तो उसे उसका खाता (Account) कहते हैं। 
किसी भी खाते के दो पक्ष होते हैं। 
1. नाम पक्ष (Debit Side)
2. जमा पक्ष (Credit Side)

Debit Side बायीं तरफ होता है और Credit Side दायीं तरफ होता है।       
12. खाते कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर : खाते तीन प्रकार के होते हैं। 
A. व्यक्तिगत खाते (Personal Accounts)
B. वास्तविक खाते (Real Accounts)  
C. नाममात्र के खाते (Nominal Accounts)

A . व्यक्तिगत खाते (Personal Accounts) : व्यक्ति, संस्था या उनके प्रतिनिधि से संबंधित खातों को व्यक्तिगत खाता कहते हैं। इन्हे तीन श्रेणियों में बाँटा गया हैं। 
i) प्राकृतिक या स्वाभाविक खाते (Natural Personal Accounts) : सृष्टि के सृजन के द्वारा व्यक्ति व्यक्ति बना है। यह प्रकृति प्रदत्त है। अतः सभी व्यक्तियों के नाम से संबंधित खाते जैसे : राम, श्याम, मोहन, व्यापार के स्वामी का पूँजी खाता इत्यादि खाते इसी श्रेणी में आयेंगे। 
ii) कृत्रिम खाते (Artificial Personal Accounts) : कृत्रिम खातों में व्यवसाय से जुडी हुई निगम और संस्थाओं से संबंधित खाते आते हैं। जैसे : बीमा, बैंक, व्यापारिक संस्था, सभी लेनदार और देनदार इत्यादि। 
iii) प्रतिनिधित्व खाते (Representative Personal Accounts) : प्रतिनिधित्व खाते व्यक्ति या समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं। जैसे अदत्त (Outstanding) वेतन का खाता जो उस कर्मचारी के खाते का प्रतिनिधित्व करता हैं। जिसकी सैलरी Due हो चुकी है यानि देनी थी पर दी नहीं गई। सिर्फ उसका Provision कर लिया गया है। 

B. वास्तविक खाते (Real Accounts) : ऐसे खाते जो अधिकार (Rights) और संपत्ति (Assets) से संबंधित होते हैं। वास्तविक खाते कहलाते हैं। इन्हे दो श्रेणियों में बाँटा गया है। 
i) मूर्त खाते (Tangible Real Accounts) :  संपत्तियों को छुआ जा सके। उन्हें मूर्त संपत्ति कहते है और इनके खातों को मूर्त खाते कहते है। जैसे : बिल्डिंग अकाउंट, फर्नीचर अकाउंट, व्हीकल अकाउंट, मशीनरी अकाउंट, कैश अकाउंट इत्यादि। 
ii) अमूर्त खाते (Intangible Real Accounts) : जिन संपत्तियों को छुआ न जा सके। उन्हें अमूर्त संपत्तियाँ कहते हैं और इनके खातों को अमूर्त खाते कहते हैं। जैसे : गुडविल, ट्रेडमार्क, पेटेंट्स, कॉपीराइट्स इत्यादि।         

C. नाममात्र के खाते (Nominal Accounts) : ऐसे खाते जो income expenses, profit और loss से संबंधित होते हैं। Nominal Accounts कहलाते हैं। जैसे कि purchase accounts, sales accounts, interest accounts, discount allow, discount receive, salary account, depreciation account, Advertisment - Expenses, Insurance Account इत्यादि। 

इस तरह के खातों की अवधि मात्र 1 वर्ष रहती है। वर्ष के अंत में इस तरह के सभी खातों को Trading, Profit and Loss Account में ट्रांसफर करके बंद कर दिया जाता है।     


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